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ग्रामीण बने माउंटेन मैन मांझी!, शिकायत के बाद भी नहीं हुई सुनवाई, तो चंदा और श्रमदान से खुद बना रहे सड़क

मोहला-मानपुर: अंबागढ़ चौकी विकासखंड के ग्राम दक्कोटोला के ग्रामीण दशकों से पक्की सड़क की सुविधा से वंचित है और कच्ची सड़क से आवागमन को मजबूर है। शासन और प्रशासन को आवेदन देने के बाद भी जब कोई सुनवाई नहीं हुई, तो ग्रामीण खुद चंदा इकट्ठा कर आपसी श्रमदान से माउंटेन मैन मांझी की तर्ज पर सड़क बनाने में जुटे हैं।

दो शिफ्ट में पहुंचते हैं ग्रामीण

महाराष्ट्र के बॉर्डर पर स्थित दक्कोटोला गांव में आलम ये हैं कि रोजाना सुबह और शाम दो पालियों में प्रत्येक घर से महिला-पुरुष ग्रामीण हाथों में फावड़ा, कुदाल और अन्य आवश्यक सामग्री लेकर गांव से एक ओर चिल्हाटी मुख्य मार्ग तथा दूसरी ओर ग्राम खुर्सीटीकुल को जोड़ने वाले, कच्चे और पथरीले मार्ग में जुटते हैं। साथ ही इस पथरीले सड़क में मुरूम और अन्य मटेरियल से पटाव कर सड़क को आवागमन लायक बनाते हैं, ताकि सुरक्षित व व्यवस्थित आवाजाही सुनिश्चित हो सके।

चंदा लेकर कर रहे आर्थिक व्यवस्था

यही नहीं ये ग्रामीण सड़क बनाने के लिए आपसी सहमति से गांव के प्रत्येक घर से 500-500 रुपए चंदा जुटाकर आवश्यक आर्थिक व्यवस्था कर रहे हैं। ग्रामीणों की माने तो हर साल बारिश से पहले वे इसी तरह से चंदे की राशि और आपसी श्रमदान से गांव की इस कच्ची सड़क को संधारित करते हैं।

ग्रामीणों के मुताबिक, उन्हें शासन और प्रशासन के सामने लिखित और मौखिक गुहार लगाते दो दशक से अधिक समय हो चुका है, लेकिन जिम्मेदार अफसर और जनप्रतिनिधि आज तक इस गांव को जोड़ने के लिए एक पक्की सड़क तक बनवा नहीं पाए।

ग्रामीणों को माकूल सड़क के अभाव में अपने गांव से लगे ग्राम पंचायत खुर्सीटीकुल तक राशन लेने के लिए दूसरे मार्ग से लंबी दूरी तय कर आवाजाही करनी पड़ती है। बारिश के दिनों में तो हालात और बद्तर हो जाता है, जब गांव की ये सड़क दलदल में बदल जाती है। इसके कारण स्कूली बच्चों का स्कूल आवागमन और आमजनों की सामान्य आवाजाही भी किसी बड़े खतरे से कम नहीं होती।

वहीं किसी मरीज को चिकित्सा के लिए गांव से बाहर ले जाना या गांव तक स्वास्थ्य अमले का पहुंच पाना भी किसी त्रासदी से कम नहीं होता। एक ओर प्रशासनिक उदासीनता की ने ग्रामीणों को अपने आवागमन को सुचारु बनाने के लिए मजदूर बनने पर मजबूर कर रखा है। वहीं दूसरी ओर जिले की कलेक्टर साहिबा ग्रामीणों की मजबूरी को जनभागीदारी का नाम देकर जवाबदेही से मुंह मोड़ती नजर आ रहीं हैं।

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